Monday, 9 March 2015

                           केकरा पर आब करब भरोसा



श्यामसुन्दर यादव ‘पथिक’

केकरा पर आब करब भरोसा
जतय पलपलमे बदलैय भाषा
छल जकरा पर सभक आशा
वैह थापि रहल अछि पासा
देखैत चल रे बौवा देखैत चल...
सकल स ओ बड्ड सुन्नर छै
देखएमे सेहो ओ भोलाभाल छै
चाम गोर मुदा मोन काला छै
तैयो ओ बड्ड दिलवाला छै देखैत चल रे बौवा देखैत चल...
रङ्ग बदलएमे गिरगिटो फिक्का छै
व्यवहार हुनक द्वैधारी तलबार छै
एतबे नहि जालिमके ओ सरदार छै
तैयो चल्ती हुन सभके बकरार छै
देखैत चल रे बौवा देखैत चल...
हुकहुक करैत हुनक जान छै
तैयो धुँधुवाइत फुँफकार छै
हमरे, हमहीटाके अभिमान छै
ओना त ओ नामी बेइमान छै
देखैत चल रे बौवा देखैत चल...
बिचारैत लिखैत चल, आगु बढैत चल
छोडि अतित, निरन्तर डेग बढबैत चल
प्रगतिक रास्ता चुनैत, भबिष्य बुनैत चल
अन्हरिया चिरैत काल्हिका भोर देखैत चल
देखैत चल रे बौवा देखैत चल...

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